असम का भाषा आंदोलन

 

असम का भाषा आंदोलन इस राज्य का एक ऐसा इतिहास है जिसको हम इस राज्य के दो मुख्य भाषाओ के बिच का यूद्ध भी बोल सकते है। लकिन क्या है ये भाषा आंदोलन? क्या आप जानना नहीं चाहोगे ?

आज का हमारा ये लेख इसी विषय पर आधारित होने वाला है। आशा करता हूँ की ये लेख आपके काफी सारे तथ्यो की जरूरतो को पूरा करेगा। तो चलिए बिना देर किए इस लेख को आरम्भ करते है।

ये तो हम सभी को ज्ञात है की असम में दो मुख्य घाटिया है। इनमें से एक है ब्रह्मपुत्र घाटी और दूसरा है बराक घाटी। लकिन दोस्तों मई आपको पहले ही बता देना चाहता हु की असम के इन दो घाटिओ की जो संस्कृति है, वो अलग अलग है। और ये सांस्कृतिक भिन्नता का जो मुख्य निम्ब है वो है इन दो घाटिओ की भाषा। 

दराचल ब्रह्मपुत्र घाटी में असामिआ भाषा की प्राधान्यता सबसे ज्यादा है। लकिन वही दूसरी तरफ बराक घाटी में असामिआ के बदले बंगाली भाषा की प्राधान्यता ज्यादा है। लकिन जनसंख्या की आकड़ो को देखे तो असामिआ बोलने वाले लोगो की संख्या असम में सबसे ज्यादा है।

अब आते है हामारे मुख्य मुद्दे पर। सं 1960 के अप्रैल महीने में असम प्रदेश कांग्रेस सरकार ने असामीज भाषा को राज्यिक मर्यादा प्रदान करने के लिए एक प्रस्ताब उत्थापित किआ। जिसके कारण बंगाली भाषिओं को इस बात से बहुत ही बड़ा झटका लगा। इसका मुख्य कारण ये नहीं था की असामिआ राज्यिक भाषा बनने जा रहा था; समस्या ये था की असामिआ को अकेले ही ये मर्यादा प्रदान करने की प्रस्तुति चल रही थी।

असम का भाषा आंदोलन

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इसी कारण पुरे बराक और ब्रह्मपुत्र घाटी में एक यूद्ध सा परिवेश छा गया। बंगाली लोग सरकार के विरोद्ध क्रोधित हो गए और धीरे धीरे बंगाली और असामिआ लोगो के बिच संघात आरम्भ होने लगे।  

सं 1960, अक्टूबर महीने के 10 तारीख को उस समय के मुख्यमंत्री (असम के) बिमला प्रशाद चलिहा ने बिधानसभा में इस बिल को पास करवाने के लिए प्रस्ताव उत्थापित किआ। और उसी साल तथा महीने के 24 अक्टूबर तारीख को ये बिल पास हुआ तथा असामिआ असम राज्य का मुख्य भाषा बन गया।

इस घटना से बंगाली भाषिओं की क्रोध दो गुना ज्यादा तेज हो गया। जिसके कारण बराक और ब्रह्मपुत्र घाटी के बिभिन्न जगह पर यूद्ध सा महल छा गया। सरकार और बंगालीऔ के बिच काफी संघर्ष हुए, बहुत सारे साधारण बंगाली यहाँ मारे गए और काफी सारे अपाहिज भी हुए।   

अपने मातृ भाषा की रक्षा करने के लिए 1961 के 5 फेब्रुअरी को Cachar Gana Sangram Parishad का गठन हुआ। ये परिषद् साधारण लोगो की स्वार्थ रक्षा करने के लिए बराक घाटी पे बिभिन्न प्रकार के प्रतिरोध करने लगे, जैसे की सिल्चर, हैलाकांदी और करीमगंज इत्यादि जगहों पर।

उनके इन आंदोलन तथा प्रतिरोधों को नेतृत्व दे रहे थे उनके तीन मुख्य नेता नीलकांता दास, रथींद्रनाथ सेन और बिन्दूभुसन चौधुरी लकिन 18 मई तारीख को इन नेताओ को सरकार ने कानून भंग करने की जुर्म में गिरफ्तार कर लिआ। इसके कारण बाद में प्रतिबादी जनता और भी ज्यादा आग बबूला हो गयी।

19 मई 1961 को प्रतिबादकारिओ ने सरकारी ऑफिस, कोर्ट, रेलवे सभी में पिकेटिंग की घोषणा कर दी। उसी दिन के दोपहर 2.30 बजे एक ट्रक पर कुल प्रतिबादकारी 9 नेताओ गिरफ्तार करके पुलिस कही ले जा रहे थे। प्रतिबादीओ में से किसी एक अनजान व्यक्ति ने उसी ट्रक पर आग लगा दिआ जिसके कारण हिंसात्मक घटनाओ को रोकने के लिए बाद में पैरामिलिटरी फाॅर्स ने प्रतिबादकारिओ के ऊपर बुलेट और लाठी से हमला करना सुरु कर दिआ।

आपको सायद ज्ञात नहीं होगा लकिन 9 प्रतिबादकारी वहाँ मौके पर मोत की नींद सो गए। उस घटना के बाद असम सरकार को पुनः भाषिक मर्यादा प्रदान के विषय पर चर्सा करना पड़ा। पहले जो केबल असामिआ भाषा को सरकारी भाषा का मर्यादा दिआ गया था वो अब बंगाली भाषा को भी दिआ गया।

लकिन यही पर आपको बता देना चाहता हु की इसको केबल बराक घाटी पर ही ऑफिसियल मर्यादा दिआ गया। वहाँ के तीन मुख्य जिल्ला जैसे की करीमगंज, हैलाकांदी और शिलचर में आज बंगाली मुख्य सरकारी भाषा है।  

2013 में असम सरकार ने फिर से बंगाली को हटाके असामीज को बराक घाटी का सरकारी भाषा घोषणा करने की चेस्टा किआ था, जिसके कारण वहाँ बहुत ज्यादा प्रतिबाद भी हुए। हालाकि अब वो मामला काफी शांत है।

 

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